CEC ज्ञानेश कुमार पर मंडराये संकट के बादल , चुनाव आयोग में फूट की खबरों के बीच महाभियोग तक पहुंचा मामला, SIR पर भी घमासान*
- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के आरोपों के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। विपक्ष की ओर से उनके खिलाफ...
- *नई दिल्ली।* देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्थाओं में से एक भारत निर्वाचन आयोग इन दिनों अभूतपूर्व सियासी और संस्थागत ह...
- आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट से गरमाई राजनीति
CEC Gyanesh Kumar Impeachment: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष के आरोपों के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। विपक्ष की ओर से उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसमें से दो प्रस्ताव खारिज हो चुके हैं जबकि एक प्रस्ताव अभी भी लंबित है। इसी बीच विपक्षी दल लगातार उनके इस्तीफे की मांग पर भी अड़े हुए हैं।

*नई दिल्ली।* देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्थाओं में से एक भारत निर्वाचन आयोग इन दिनों अभूतपूर्व सियासी और संस्थागत हलचल के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों की खबरें सामने आ रही हैं, तो दूसरी तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की मांग ने राष्ट्रीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। भाकपा माले ने इस मामले में सबसे आक्रामक रुख अपनाते हुए राष्ट्रपति को पत्र लिखकर सीईसी को हटाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण SIR को तुरंत रोकने की मांग की है।
आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट से गरमाई राजनीति
पूरा विवाद हाल ही में एक राष्ट्रीय अखबार में छपी रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कई अहम फैसलों पर औपचारिक असहमति दर्ज कराई है। खासकर मतदाता सूची के पुनरीक्षण और कुछ राज्यों में चुनावी तैयारियों को लेकर दोनों आयुक्तों की राय मुख्य चुनाव आयुक्त से अलग बताई जा रही है।
भाकपा माले का कहना है कि यह अंदरूनी असहमति वही बातें हैं जो वह पिछले कई महीनों से कह रही थी। पार्टी का आरोप है कि आयोग फैसले एकतरफा तरीके से ले रहा है और मतदाता सूची के नाम पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हो रही है।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि तीन सदस्यीय आयोग में अलग-अलग विचार आना सामान्य लोकतांत्रिक और संस्थागत प्रक्रिया है। इसे संस्थागत संकट के तौर पर देखना गलत है। हर फैसले पर चर्चा होती है और अंत में बहुमत से निर्णय लिया जाता है।
भाकपा माले ने क्यों उठाई महाभियोग की मांग?
भाकपा माले ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर दो बड़ी मांगें रखी हैं।
पहली – संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाए।
दूसरी – देशभर में चल रही SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रोका जाए।
पार्टी का तर्क है कि SIR के कारण लाखों गरीब, प्रवासी मजदूर और वंचित वर्ग के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से कट रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तो नाम कटने के बाद दोबारा जोड़ने के लिए हजारों अपीलें दाखिल करनी पड़ी हैं। पार्टी ने कहा कि चुनाव कराना ही सफलता नहीं है, बल्कि हर पात्र मतदाता का नाम सूची में बना रहना भी उतना ही जरूरी है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कितने प्रस्ताव?
ज्ञानेश कुमार का मामला इसलिए भी ऐतिहासिक बन गया है क्योंकि वे देश के पहले ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त बन गए हैं जिनके खिलाफ एक साथ कई महाभियोग नोटिस लाए गए हैं।
जानकारी के मुताबिक ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को देश के 26वें सीईसी के तौर पर पदभार संभाला था और उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है, जब वे 65 साल के हो जाएंगे।
उनके खिलाफ पहला नोटिस इसी साल 12 मार्च 2026 को लाया गया। लोकसभा में 130 सांसदों और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर से यह नोटिस दिया गया, जिसे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन ने खारिज कर दिया।
दूसरा नोटिस राज्यसभा में 24 अप्रैल 2026 को 73 सांसदों के हस्ताक्षर से लाया गया, जिसमें 9 गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यह प्रस्ताव अभी भी लंबित बताया जा रहा है। अब विपक्ष संसद के प्रस्तावित विशेष सत्र में चौथे नोटिस की तैयारी कर रहा है।
महाभियोग की प्रक्रिया आसान है क्या?
संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना उतना ही कठिन है जितना सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाना। इसके लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर से स्पीकर या सभापति को नोटिस देना होता है।
नोटिस स्वीकार होने पर तीन सदस्यीय जांच समिति बनती है, जिसमें CJI या सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ कानूनविद होते हैं। समिति की रिपोर्ट के बाद दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी है, तब जाकर राष्ट्रपति अंतिम मंजूरी देते हैं। आजादी के बाद से अब तक किसी भी सीईसी को इस प्रक्रिया से हटाया नहीं गया है।
आखिर कौन हैं ज्ञानेश कुमार?
केरल कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक अनुभव काफी लंबा रहा है। वे केंद्र सरकार में रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव, गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अपर सचिव, संसदीय कार्य मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय में सचिव जैसे अहम पदों पर रह चुके हैं। 31 जनवरी 2024 को रिटायर होने के बाद 15 मार्च 2024 को उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया था।
महाभियोग पर आगे क्या होगा?
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग निष्पक्षता खो रहा है, जबकि सरकार और आयोग का कहना है कि यह सब सामान्य प्रक्रिया है। आने वाले दिनों में संसद के विशेष सत्र में इस मुद्दे पर बड़ा हंगामा होने के आसार हैं।
देखना होगा कि महाभियोग का यह प्रस्ताव जांच समिति तक पहुंचता है या पहले की तरह खारिज हो जाता है। लेकिन इतना तय है कि SIR और सीईसी के मुद्दे ने 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनावी सुधारों पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है।