आगरा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल, SN मेडिकल कॉलेज में 4 घंटे तक तड़पती रही 22 साल की प्रसूता, दो विभागों के बीच दौड़ा-दौड़ा कर डाक्टरों ने ली जान, जमकर हुआ हंगामा
- आगरा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर सवाल – SN मेडिकल कॉलेज में 4 घंटे तक भटकती रही 22 साल की महिला, इमरजेंसी से स्त्री...
- मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की लापरवाही और उदासीनता के कारण तड़पती प्रसूता
- देश की ताजनगरी आगरा के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल SN मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही का एक और सनसनीखेज माम...
Agra SN Medical College News: आगरा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर सवाल – SN मेडिकल कॉलेज में 4 घंटे तक भटकती रही 22 साल की महिला, इमरजेंसी से स्त्री रोग विभाग के चक्कर में गई जान, परिजनों का हंगामा*
SN मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की लापरवाही और उदासीनता के कारण तड़पती प्रसूता
Medical Negligence Agra: देश की ताजनगरी आगरा के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल SN मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही का एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां 22 वर्षीय गर्भवती युवती विजय कुमारी की इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में करीब चार घंटे तक उसे इमरजेंसी और स्त्री रोग विभाग के बीच दौड़ाया जाता रहा, लेकिन डॉक्टरों ने उसे भर्ती तक नहीं करने की जहमत नहीं उठाई । जब मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत और 112 पर पुलिस को सूचना दी तब जाकर उसे भर्ती किया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
दूसरी तरफ मेडिकल कॉलेज प्रशासन अपने बचाव में उतर आया। प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता का कहना है कि महिला की डिलीवरी पहले ही कहीं और हो चुकी थी, हालत बिगड़ने पर उसे यहां लाया गया था। उसे पूरा इलाज दिया गया, वेंटिलेटर और ICU की सुविधा भी दी गई।पूरे मामले में जांच समिति गठित कर दी गई है।
क्या है पूरी घटना ?
मृतका विजय कुमारी आगरा के तांतपुर क्षेत्र की रहने वाली थी, जिसकी उम्र महज 22 साल ही थी। परिजनों के मुताबिक शुक्रवार शाम करीब 7 बजे पारिवारिक विवाद के दौरान विजय के पेट में चोट लग गई थी। गर्भवती होने और पेट में चोट लगने के कारण उसकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी।
परिजन उसे आनन-फानन में SN मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में लेकर पहुंचे। मृतका के जीजा गौरव ने बताया कि इमरजेंसी में पहुंचने पर डॉक्टरों ने कहा कि यह गायनी का केस है, आप स्त्री रोग विभाग में जाओ। जब वे स्त्री रोग विभाग पहुंचे तो वहां से फिर कहा गया कि पहले इमरजेंसी में दिखाओ।
आरोप है कि इसी तरह इमरजेंसी और स्त्री रोग विभाग के बीच करीब 4 घंटे तक परिजन अपनी मरीज को लेकर भटकते रहे। दर्द से तड़पती विजय को किसी ने भर्ती नहीं किया। न तो कोई सीनियर डॉक्टर देखने आया और न ही कोई इलाज शुरू हुआ।
CM पोर्टल और 112 पर शिकायत के बाद हुई भर्ती
जब अस्पताल में कहीं सुनवाई नहीं हुई तो परिजनों ने अपने एक परिचित की मदद से मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) और फेसबुक पेज पर शिकायत दर्ज कराई। साथ ही 112 नंबर पर कॉल करके पुलिस को भी सूचना दी।
परिजनों ने दावा किया है कि जब ऊपर से फोन आया, तब जाकर अस्पताल प्रशासन हरकत में आया और देर रात महिला को भर्ती किया गया। लेकिन तब तक उसकी हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी।
पहले ही हो चुकी थी डिलीवरी – प्राचार्य का बयान
इस पूरे मामले पर SN मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता ने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने बताया कि विजय कुमारी गर्भवती नहीं थी। उसकी डिलीवरी पहले ही किसी दूसरे प्राइवेट अस्पताल में हो चुकी थी। डिलीवरी के बाद उसकी हालत बिगड़ गई थी, इसलिए उसे SN मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था।
डॉ. गुप्ता के अनुसार महिला को इमरजेंसी में भर्ती किया गया था। हालत गंभीर होने के कारण उसे तुरंत वेंटिलेटर पर लिया गया और बाद में ICU में शिफ्ट करके जान बचाने की पूरी कोशिश की गई। उसकी रिपोर्ट पहले से ही काफी गंभीर थी। तमाम प्रयासों के बावजूद शनिवार सुबह उसकी मौत हो गई।
परिजनों ने लगाया लापरवाही का आरोप
परिजनों ने साफ कहा है कि अगर समय पर इलाज मिल जाता तो आज विजय जिंदा होती। 4 घंटे तक एक गर्भवती महिला को इस तरह भटकाना कहां की इंसानियत है? SN मेडिकल कॉलेज में अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहां डॉक्टर मरीज को देखने की बजाय दो विभागों के बीच घुमाते रहे ।
उन्होंने मांग की है कि इस मामले में दोषी डॉक्टरों और स्टाफ के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं अस्पताल प्रशासन ने कहा है कि इस मामले की जांच के लिए एक समिति बना दी गई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
SN मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
यह कोई पहला मामला नहीं है जब SN मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था पर सवाल उठे हों। इससे पहले भी कई बार मरीजों को बेड न मिलने, डॉक्टरों के समय पर न आने और दलालों के सक्रिय होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। सरकार भले ही स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।