Bangladesh Port Deal : बांग्लादेश ने चीन को झटका, डेनमार्क से किया 30 साल का समझौता, भारत के लिए गुड न्यूज - Democracy Samachar
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बांग्लादेश ने चीन को झटका, डेनमार्क से किया 30 साल का समझौता, भारत के लिए गुड न्यूज

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📌 मुख्य बिंदु (Highlights)
  • बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश ने चीन के विरुद्ध एक अंतर्राष्ट्रीय  बड़ा दांव खेला है. उसने चीन के एकाधिकार को तोड़ने ...
  • बंगाल की खाड़ी में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। पिछले एक दशक से चीन बांग्लादेश के समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर ...
  • लेकिन अब बांग्लादेश की नई सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरे क्षेत्र के रणनीतिक संतुलन को हिला कर रख दिया है। ढा...

Bangladesh Port Deal : बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश ने चीन के विरुद्ध एक अंतर्राष्ट्रीय  बड़ा दांव खेला है. उसने चीन के एकाधिकार को तोड़ने के लिए डेनमार्क, सऊदी अरब और UAE को अपने बंदरगाह सौंप दिये हैं, जोकि भारत के लिये एक बहुत अच्छी और बड़ी खबर है।

Bangladesh balancing China : बंगाल की खाड़ी में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। पिछले एक दशक से चीन बांग्लादेश के समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर में अपनी पकड़ मजबूत करता आ रहा है, जिसे भारत अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानता रहा है।

लेकिन अब बांग्लादेश की नई सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरे क्षेत्र के रणनीतिक संतुलन को हिला कर रख दिया है। ढाका ने अपने सबसे महत्वपूर्ण चटगांव बंदरगाह के विस्तार और संचालन के लिए सिर्फ चीन पर निर्भर रहने के बजाय यूरोप और खाड़ी देशों की बड़ी कंपनियों को आगे किया है।

बांग्लादेश ने डेनमार्क की दिग्गज शिपिंग कंपनी के साथ 30 साल का ऐतिहासिक समझौता किया है, साथ ही सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की कंपनियों को भी बंदरगाह प्रबंधन में हिस्सेदारी दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बांग्लादेश की एक सोची-समझी ‘बैलेंसिंग स्ट्रैटेजी’ है, जिसके तहत वह चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना चाहता है और किसी एक देश पर निर्भरता खत्म करना चाहता है।

क्या है डेनमार्क के साथ 30 साल की डील ?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश सरकार ने डेनमार्क की एपी मोलर-मार्स्क ग्रुप की कंपनी APM Terminals के साथ एक मेगा डील साइन की है। यह समझौता चटगांव पोर्ट के सबसे अहम प्रोजेक्ट – लाडिया कंटेनर टर्मिनल को लेकर हुआ है।

इस डील के तहत:

– कुल अवधि: 30 साल

– निवेश: लगभग 55 करोड़ डॉलर यानी करीब 4600 करोड़ रुपये

– काम: कंपनी टर्मिनल की पूरी डिजाइनिंग, फाइनेंसिंग, निर्माण और फिर उसका संचालन करेगी।

– मॉडल: यह Build-Operate-Transfer नहीं, बल्कि एक ऐसा मॉडल है जिसमें बंदरगाह की संप्रभुता और मालिकाना हक पूरी तरह से बांग्लादेश पोर्ट अथॉरिटी के पास ही रहेगा। डेनमार्क की कंपनी सिर्फ ऑपरेटर के तौर पर काम करेगी और राजस्व में हिस्सेदारी लेगी।

यह मॉडल श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट से बिल्कुल अलग है, जहां चीन ने 99 साल की लीज पर बंदरगाह का नियंत्रण ले लिया था।

बांग्लादेश ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी जमीन या समुद्री संपत्ति किसी को बेच नहीं रहा है, बल्कि उसके विकास के लिए दुनिया की सबसे अच्छी टेक्नोलॉजी और निवेश ला रहा है।

सऊदी अरब और UAE की भी एंट्री

सिर्फ डेनमार्क ही नहीं, बांग्लादेश ने खाड़ी देशों को भी अपने पोर्ट सेक्टर में बड़ी भूमिका दी है।

– सऊदी अरब की Red Sea Gateway Terminal कंपनी को पटुआखली में पायरा पोर्ट के एक हिस्से के संचालन का जिम्मा दिया जा रहा है।

– UAE की DP World, जो दुनिया की सबसे बड़ी पोर्ट ऑपरेटर कंपनियों में से एक है, उसे भी चटगांव और मातरबारी डीप सी पोर्ट के लॉजिस्टिक्स और कंटेनर हैंडलिंग में शामिल किया गया है।

मातरबारी डीप सी पोर्ट भारत और जापान के सहयोग से बन रहा है, जिसे चीन के प्रभाव वाले इलाके में भारत का जवाब माना जाता है।

बांग्लादेश की नई रणनीति – एक देश पर निर्भरता नहीं

पिछले कुछ सालों तक बांग्लादेश के लगभग सभी बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट्स में चीन की कंपनियां ही आगे थीं। चटगांव से लेकर कॉक्स बाजार तक चीन की चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी और चाइना स्टेट कंस्ट्रक्शन कंपनी को कई ठेके मिले थे।

इससे भारत और अमेरिका दोनों चिंतित थे कि कहीं बांग्लादेश भी पाकिस्तान और श्रीलंका की तरह चीन के ‘कर्ज के जाल’ में न फंस जाए।

लेकिन नई सरकार ने साफ संदेश दिया है कि वह ‘सभी के साथ दोस्ती, किसी के साथ दुश्मनी नहीं’ की नीति पर चलेगी। एक ही देश पर निर्भर रहने से न तो बेहतर टेक्नोलॉजी मिलती है और न ही बेहतर मोलभाव करने की ताकत।

इसलिए डेनमार्क, सऊदी अरब और UAE को लाकर ढाका ने तीन बड़े फायदे लिए हैं:

1. चीन का एकाधिकार टूटा: अब बंगाल की खाड़ी में सिर्फ चीनी कंपनी की मौजूदगी नहीं रहेगी।

2. पश्चिमी देशों का भरोसा जीता: अमेरिका और यूरोप चाहते थे कि बांग्लादेश चीन से दूरी बनाए।

3. निवेश में विविधता: अलग-अलग देशों से निवेश आने से अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

 

भारत के लिए इसके क्या मायने हैं ?

भारत के लिए यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है और राहत भरा भी।

पहला – सुरक्षा के लिहाज से: चटगांव बंदरगाह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए लाइफलाइन है। भारत अगरतला तक सामान भेजने के लिए चटगांव पोर्ट का इस्तेमाल करता है। अगर इस पोर्ट पर चीन का पूरा नियंत्रण हो जाता, तो भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा होता। अब डेनमार्क जैसी तटस्थ और पेशेवर कंपनी के आने से यह खतरा काफी कम हो गया है।

 

दूसरा – हिंद महासागर में संतुलन: चीन बंगाल की खाड़ी में पनडुब्बियों और जासूसी जहाजों की तैनाती बढ़ा रहा है। बांग्लादेश के पोर्ट्स पर चीन की मौजूदगी उसे लॉजिस्टिक सपोर्ट देती। अब कई देशों की मौजूदगी से चीन के लिए खुले तौर पर सैन्य इस्तेमाल करना मुश्किल होगा।

 

तीसरा – कूटनीतिक जीत: भारत लंबे समय से बांग्लादेश को समझा रहा था कि पोर्ट सेक्टर में विविधता लाए। अब बांग्लादेश का यह कदम कहीं न कहीं भारत की कूटनीति की जीत भी है।

हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी भी देते हैं कि यह कहना जल्दबाजी होगी कि बांग्लादेश ने चीन को पूरी तरह से बाहर कर दिया है। चीन अभी भी बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और कई प्रोजेक्ट्स में उसकी गहरी पैठ है। चीन को पूरी तरह से नजरअंदाज करना बांग्लादेश के लिए भी संभव नहीं है।

इसलिए भारत को इस नई स्थिति को बहुत बारीकी से देखना होगा। यह संतुलन बांग्लादेश के लिए फायदेमंद है, लेकिन भारत को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि मातरबारी और चटगांव में उसकी अपनी पकड़ और मजबूत हो।

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